डॉ. दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति सत्ता नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक होते हैं। जब युवा शिक्षा, रोजगार, पारदर्शिता और भविष्य से जुड़े प्रश्नों को लेकर खड़े होते हैं, तब वे केवल अपने अधिकारों की बात नहीं करते, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की जवाबदेही को भी स्मरण कराते हैं। भारतीय इतिहास का निष्पक्ष अध्ययन बताता है कि छात्र और युवा आंदोलनों ने अनेक अवसरों पर सार्वजनिक नीति, शासन और राजनीतिक विमर्श को गहराई से प्रभावित किया है। किंतु यह कहना कि प्रत्येक आंदोलन ने सरकार गिरा दी या मंत्री हटवा दिए, इतिहास का सरलीकरण होगा। सत्य यह है कि लोकतंत्र में परिवर्तन प्रायः जनमत, संवैधानिक प्रक्रिया, न्यायपालिका, मीडिया, विपक्ष और नागरिक समाज—इन सभी के संयुक्त प्रभाव से आता है।
स्वतंत्रता के बाद 1950 के दशक में भाषाई राज्यों की मांग को लेकर विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक जनआंदोलन हुए, जिनमें विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी रही। इन आंदोलनों और व्यापक जनदबाव के परिणामस्वरूप भारत सरकार ने 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया तथा 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम लागू किया। यह इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र में संगठित जनमत संवैधानिक परिवर्तन का माध्यम बन सकता है।
सन् 1965 का तमिलनाडु का हिंदी-विरोधी छात्र आंदोलन स्वतंत्र भारत के सबसे महत्वपूर्ण छात्र आंदोलनों में गिना जाता है। आंदोलन के बाद केंद्र सरकार ने यह आश्वासन दिया कि गैर-हिंदी भाषी राज्यों की सहमति के बिना अंग्रेज़ी का प्रयोग समाप्त नहीं किया जाएगा। बाद में 1967 के राजभाषा (संशोधन) अधिनियम ने इस नीति को विधिक आधार प्रदान किया। यह घटना बताती है कि संवेदनशील राष्ट्रीय प्रश्नों का स्थायी समाधान अंततः संवाद और संवैधानिक प्रक्रिया से ही निकलता है।
सन् 1974 में गुजरात का नव निर्माण आंदोलन प्रारम्भ में छात्रावास शुल्क और महँगाई के विरोध से शुरू हुआ, किंतु शीघ्र ही यह भ्रष्टाचार और सुशासन के व्यापक प्रश्न से जुड़ गया। आंदोलन के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल ने इस्तीफा दिया तथा बाद में विधानसभा भंग कर दी गई। इतिहासकार इसे स्वतंत्र भारत के सबसे प्रभावशाली छात्र-जन आंदोलनों में से एक मानते हैं।
इसी वर्ष बिहार छात्र संघर्ष समिति के नेतृत्व में प्रारम्भ हुआ आंदोलन लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में "संपूर्ण क्रांति" के रूप में विकसित हुआ। 1975 में देश में आपातकाल घोषित हुआ और 1977 के आम चुनावों में सत्ता परिवर्तन हुआ। अधिकांश इतिहासकारों का मत है कि इस परिवर्तन की पृष्ठभूमि में जेपी आंदोलन, आपातकाल के अनुभव, विपक्षी एकता और जनता के व्यापक जनमत—इन सभी कारकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
1979 से 1985 तक चला असम आंदोलन, जिसका नेतृत्व अखिल असम छात्र संघ ने किया, अंततः 1985 के असम समझौते तक पहुँचा। यह भारतीय लोकतंत्र का ऐसा उदाहरण है जहाँ दीर्घकालीन जनआंदोलन का समाधान संवैधानिक वार्ता और समझौते के माध्यम से निकला।
इन ऐतिहासिक घटनाओं का निष्पक्ष अध्ययन एक समान निष्कर्ष प्रस्तुत करता है। लोकतंत्र में सफल आंदोलन वे रहे जिनके उद्देश्य स्पष्ट थे, जिनका आधार व्यापक जनसमर्थन था और जिन्होंने अंततः संवैधानिक समाधान का मार्ग अपनाया। जहाँ संवाद स्थापित हुआ वहाँ नीतियाँ बदलीं; जहाँ संवाद में विलम्ब हुआ वहाँ सामाजिक और राजनीतिक तनाव बढ़ा।
आज भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में है। यही युवा विज्ञान, तकनीक, उद्यमिता, कृषि, रक्षा, शिक्षा, खेल और लोकतांत्रिक संस्थाओं में देश का भविष्य गढ़ रहा है। इसलिए राजनीति की धुरी युवा केवल उसकी संख्या के कारण नहीं, बल्कि उसके विचार, श्रम, नवाचार और लोकतांत्रिक सहभागिता के कारण है।
इतिहास यह भी सिखाता है कि लोकतंत्र में अधिकार और उत्तरदायित्व एक-दूसरे के पूरक हैं। सरकार का दायित्व है कि वह नागरिकों की बात सुने, समय पर संवाद स्थापित करे और पारदर्शी निर्णय ले। वहीं युवाओं का दायित्व है कि वे संविधान, कानून और अहिंसक लोकतांत्रिक मूल्यों के भीतर रहकर अपनी बात रखें। संविधान के दायरे में किया गया संघर्ष ही सबसे अधिक नैतिक शक्ति प्राप्त करता है।
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ अंतिम निर्णय सड़क पर नहीं, संविधान की व्यवस्था के भीतर होता है। जनमत परिवर्तन की प्रेरणा दे सकता है, पर स्थायी परिवर्तन कानून, संसद, न्यायपालिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से ही आता है। यही भारतीय गणराज्य की सबसे बड़ी शक्ति है।
इतिहास का संदेश स्पष्ट है—युवा लोकतंत्र की ऊर्जा हैं और संविधान उसकी आत्मा। जब ऊर्जा और संवैधानिक मर्यादा साथ चलते हैं, तब राष्ट्र आगे बढ़ता है। जब दोनों के बीच संवाद कमजोर पड़ता है, तब असंतोष जन्म लेता है। इसलिए किसी भी लोकतंत्र की सफलता इस बात से नहीं मापी जाती कि विरोध कितना हुआ, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि संवाद कितना सार्थक हुआ।
लाठियाँ क्षणिक भय उत्पन्न कर सकती हैं, किंतु विश्वास नहीं। इतिहास बताता है कि स्थायी समाधान दमन से नहीं, संवाद से; टकराव से नहीं, सहभागिता से; और सत्ता के एकतरफा निर्णय से नहीं, बल्कि जनता के विश्वास से जन्म लेते हैं। यही भारतीय लोकतंत्र की ऐतिहासिक परंपरा है और यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति भी।